बुद्ध का करुणामय उपदेश

 


बुद्ध का करुणामय उपदेश


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एक समय की बात है, जब भगवान बुद्ध अपने शिष्यों के साथ एक छोटे से गाँव में आए।
रात हो चुकी थी, आसमान में चाँदनी छाई हुई थी।
गाँव के लोग बुद्ध के आगमन से बहुत प्रसन्न थे, और उन्होंने उनसे एक कथा सुनाने की प्रार्थना की।
बुद्ध ने उनकी बात मानी और सभी को पास बुलाया।
सब लोग ध्यान से उनकी बातें सुनने के लिए तैयार हो गए।



बुद्ध ने अपनी आँखें बंद कीं और धीरे-धीरे बोलना शुरू किया, "बहुत समय पहले की बात है।
एक साधु था जो जंगल में ध्यान करता था।
वह साधु बहुत ही साधारण जीवन जीता था, परंतु उसका हृदय बड़ा विशाल था।
उसने अपने जीवन का एक ही उद्देश्य बनाया था—दूसरों की भलाई करना।"




सभी श्रोता बुद्ध की बातों में खो से गए थे।
बुद्ध ने एक छोटा सा विराम लिया, फिर आगे बोले, "उस साधु के पास एक दिन एक व्यक्ति आया,
जो बहुत ही दुखी और परेशान था।
उस व्यक्ति ने साधु से पूछा, 'महाराज, मैं बहुत दुखी हूँ, मेरी जिंदगी में कोई शांति नहीं है।
मुझे ऐसा उपाय बताइए जिससे मैं अपने दुखों से मुक्त हो सकूँ।'"




बुद्ध ने इस वाक्य के बाद एक और छोटा विराम लिया, जिससे श्रोता उत्सुक हो उठे।
बुद्ध ने फिर कहा, "साधु ने उस व्यक्ति की ओर ध्यान से देखा और मुस्कुराते हुए बोले, 'तुम्हारे दुख का कारण यह है कि तुम दूसरों की भलाई के बारे में नहीं सोचते।
तुम्हारा मन सदा अपने ही स्वार्थ में उलझा रहता है।'
इस पर वह व्यक्ति क्रोधित हो गया और बोला, 'आप ऐसा कैसे कह सकते हैं?
मैं तो हमेशा दूसरों की मदद करता हूँ।'"



सभी श्रोता चुपचाप सुन रहे थे, बुद्ध ने फिर से एक विराम लिया।
बुद्ध ने फिर कहा, "साधु ने उस व्यक्ति को एक बीज दिया और कहा, 'इसे अपने बगीचे में लगाओ और देखो क्या होता है।
पर ध्यान रखना, जब तक यह बीज फूल में परिवर्तित न हो जाए, तब तक तुम्हें किसी से भी बुरा नहीं सोचना चाहिए।'
वह व्यक्ति उस बीज को लेकर अपने घर चला गया और उसे अपने बगीचे में लगा दिया।"


अब श्रोताओं की उत्सुकता और बढ़ गई थी।
बुद्ध ने फिर कुछ पल का विराम लिया और बोले, "कई दिन बीत गए, पर वह बीज फूल में नहीं बदला।
वह व्यक्ति परेशान हो गया और फिर साधु के पास लौटा।
उसने साधु से कहा, 'महाराज, यह बीज तो फूल में नहीं बदल रहा है।
आपने ऐसा क्यों कहा?'"

श्रोताओं के बीच एक सन्नाटा छा गया था।
बुद्ध ने फिर कहा, "साधु ने हँसते हुए कहा, 'क्योंकि तुम्हारे मन में अभी भी क्रोध और द्वेष है।
जब तक तुम दूसरों के लिए निस्वार्थ भाव से कुछ नहीं करोगे, तब तक यह बीज कभी नहीं फलेगा।'
वह व्यक्ति साधु की बात समझ गया और उसने अपने मन को शुद्ध करने का संकल्प लिया।
धीरे-धीरे उसके मन का क्रोध और द्वेष समाप्त हो गया।
और एक दिन वह बीज एक सुंदर फूल में बदल गया।'"

बुद्ध की कहानी समाप्त हो चुकी थी।
श्रोताओं के बीच एक गहरा मौन था, सब सोच में डूबे हुए थे।
बुद्ध ने अंत में कहा, "यह कथा हमें सिखाती है कि जब तक हम अपने भीतर के विकारों को समाप्त नहीं करेंगे,
तब तक हम सच्चे सुख की प्राप्ति नहीं कर सकते।
सच्चा सुख दूसरों की भलाई में ही निहित है।"

सभी श्रोता बुद्ध के इस उपदेश से गहरे प्रभावित हुए।
उन्होंने अपने जीवन में करुणा और प्रेम को स्थान देने का संकल्प लिया।
बुद्ध ने अंत में एक मुस्कान के साथ कहा, "याद रखो, मनुष्य का हृदय एक बगीचे की तरह है।
जैसे तुम उसे सजाओगे, वैसे ही उसमें फूल खिलेंगे।
इसलिए अपने हृदय को हमेशा प्रेम और करुणा से सजाओ।"

इस प्रकार बुद्ध की यह कथा सभी के दिलों में गहराई से बैठ गई।
गाँव के लोग अपने घरों को लौट गए,
लेकिन उनके दिलों में बुद्ध की यह शिक्षा सदा के लिए अंकित हो गई।
और इस प्रकार बुद्ध का यह उपदेश उस गाँव के हर व्यक्ति के जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ बन गया।

समाप्त।

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